Saturday, September 19, 2020

नक़ाब

खुदगर्ज़, बेगैरत, ज़माने ने जो-जो दे दिए
महफ़िल में वो सारे खिताब लेके चलता हूँ

बज़्म की लाज रखने को, लो मैंने होंठ सिल लिए
दबा के सुर्ख आंखों में, हर जवाब लेके चलता हूं
                                ( बज़्म = gathering) 

कुरेद कर खंजर से नब्ज़ को सौ-सौ दफा
वो पूछते हैं क्यों तबीयत मैं खराब लेके चलता हूँ

बहोत थक चुका हूं मैं, कि मेरी रूह छलनी है
कभी है बर्फ़ सीने में, कभी सैलाब लेके चलता हूं

खुद के चेहरे को तो मैंने कबका जला डाला
दुनिया के लिए अब, बस इक नक़ाब लेके चलता हूँ

1 comment:

  1. Wah wah !! Wat a true picture of the emotional struggles of life !!

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