और कभी कभी तो वो बगीचों में जान-बूझ कर पैसे गिरा आता था...छोटे बच्चों को जो खुशी गिरा हुआ रुपया पाने से मिलती है, उसका एक हिस्सा बनने की यह तरकीब मुझे छू सी गयी..वो अनदेखी खुशियाँ इधर उधर कोनों में चुपके से डाल रहा था..और में खो चुका था छुपन-छुपाई और विष-अमृत के खयालों में ।
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