Saturday, September 19, 2020

छटपटाहट

 

छटपटा रही हैं रातों में, ज़ुर्रतें जो कभी की ही नहीँ
करवटों में जाग रही हैँ , ज़िंदगियां जो कभी जी ही नहीँ 
आज फिर अपनी ही याद आ रही है मुझ को बेहद
बस बह  रहा है, दरिये ने थमकर, सांस तो कभी ली ही नहीँ ! 

कई हसीन जाम थे, पीने की जिनको, आयी कोई शाम ही नहीँ
तमाम हसरतें, तमाम रास्ते, जिन्हें मिला कोई अंजाम ही नहीँ
यूँ तो बिछड़े ख्वाब हैँ कहते, हम तुमसे शिकवे छोड़ चुके
पर कह नहीँ सकता, मुझपर फिर भी, कहीं कोई इल्ज़ाम ही नहीँ

छटपटा रही हैं रातों में, ज़ुर्रतें जो कभी की ही नहीँ
करवटों में जाग रही हैँ , ज़िंदगियां जो कभी जी ही नहीँ 



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